
ढोल की गूंज और ऊर्जावान भांगड़ा नृत्य खुशी, उत्साह और समृद्धि का प्रतीक है। यहाँ जानें लोहड़ी में भांगड़ा करने की परंपरा, इसका सांस्कृतिक महत्व और इससे जुड़ी लोक मान्यताएँ।
लोहड़ी में भांगड़ा उत्सव की जान माना जाता है, जो खुशी, ऊर्जा और भाईचारे का प्रतीक है। ढोल की थाप पर किया जाने वाला यह नृत्य लोहड़ी की रात को और भी जीवंत बना देता है। इस लेख में जानिए लोहड़ी में भांगड़ा का महत्व और इसकी परंपरा।
लोहड़ी का पर्व पंजाब की समृद्ध और जीवंत सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है, जिसमें भांगड़ा नृत्य का विशेष स्थान है। भांगड़ा केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि नई फसल के पकने की खुशी, परिश्रम की सफलता और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है। परंपरागत रूप से इसे पुरुष करते हैं, लेकिन आज महिलाएं और बच्चे भी पूरे उत्साह से इसमें शामिल होते हैं।
लोहड़ी की पवित्र आग के चारों ओर ढोल की थाप पर किया जाने वाला भांगड़ा खुशी, उत्साह और जीवन के प्रति उमंग को प्रकट करता है। यह नृत्य प्रकृति और भगवान का धन्यवाद करने का एक सुंदर तरीका है। भांगड़ा लोहड़ी के त्योहार को और खास बनाता है तथा लोगों के बीच प्रेम, एकता और सांस्कृतिक गौरव को मजबूत करता है।
भांगड़ा पंजाब की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ एक प्रसिद्ध लोकनृत्य और संगीत शैली है। इसकी शुरुआत पंजाब के किसानों द्वारा अच्छी फसल की खुशी मनाने के लिए की गई थी। ढोल की दमदार ताल पर किया जाने वाला यह नृत्य ऊर्जा, उत्साह और सामूहिक आनंद का प्रतीक है। भांगड़ा में कूद, घूम और जोशीले कदम किसानों की मेहनत, प्रकृति से जुड़ाव और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। समय के साथ भांगड़ा केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि पंजाब की परंपरा, एकता और उल्लास का प्रतीक बन गया है।
लोहड़ी और भांगड़ा का आपस में गहरा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध है। लोहड़ी के अवसर पर किया जाने वाला भांगड़ा केवल नृत्य नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव और सामाजिक एकता का प्रतीक है। ढोल की गूंजती ताल पर लोग सभी भेदभाव भूलकर एक साथ नृत्य करते हैं, जिससे आपसी भाईचारा और मेल-जोल बढ़ता है। परंपरागत रूप से गाँवों की चौपालों में होने वाला यह आयोजन समुदाय को एक सूत्र में बांधता है। भांगड़ा के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं, कृषि संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ती है। इस तरह लोहड़ी और भांगड़ा एक साथ मिलकर पंजाब की समृद्ध परंपराओं, उत्साह और सामूहिक जीवन भावना को सजीव रूप में प्रस्तुत करते हैं।
लोहड़ी के अवसर पर किया जाने वाला भांगड़ा केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि खेती, प्रकृति और जीवन के उत्सव की सजीव अभिव्यक्ति है। इसकी विभिन्न मुद्राएँ और ऊर्जावान कदम बीज बोने, फसल की देखभाल करने और कटाई के बाद मिलने वाले आनंद को दर्शाते हैं। यह नृत्य किसानों की मेहनत, धरती से उनके गहरे रिश्ते और अच्छी फसल के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता को प्रकट करता है। ढोल की तेज़ थाप पर किया जाने वाला भांगड़ा मन में उत्साह, शरीर में ऊर्जा और वातावरण में सकारात्मकता भर देता है। यही कारण है कि भांगड़ा लोहड़ी के उत्सव को पूर्णता प्रदान करता है और सामूहिक खुशी व एकता का प्रतीक बन जाता है।ती हैं।
भांगड़ा करने से पहले पारंपरिक पंजाबी वेशभूषा जैसे चमकीले कुर्ते, लुंगी या तहमत और रंगीन पगड़ी धारण की जाती है। ढोल, चिमटा और काटो जैसे वाद्ययंत्र वातावरण में जोश भर देते हैं। लोहड़ी की ठंडी रात में अलाव के चारों ओर नृत्य करने से शरीर में ऊर्जा और गर्माहट बनी रहती है।
भांगड़ा के प्रमुख स्टेप्स
शुरुआती मुद्रा: पैरों को कंधों की चौड़ाई पर रखकर खड़े हों, हाथों की उंगलियाँ मोड़कर हथेलियों पर टिकाएँ।
कूद और किक: एक पैर पर उछलते हुए दूसरे पैर से बाहर की ओर किक करें। यही प्रक्रिया दोनों पैरों से बारी-बारी दोहराई जाती है।
हाथ और कंधे: बाहों को फैलाना, सिर के ऊपर उठाना और कंधों को ढोल की ताल पर थिरकाना भांगड़ा की खास पहचान है।
ढोल की थाप: ढोल की तेज़ और जोशीली धुन के साथ स्टेप्स बदलते हैं और नृत्य की गति बढ़ती जाती है।
प्रसिद्ध भांगड़ा गीत हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में उपलब्ध हैं। ये अपनी तेज़, जोशीली धुनों के लिए मशहूर होते हैं, जिनमें ढोल और तूंबी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रमुख रूप से उपयोग किया जाता है।
तेरा यार बोल्डा
दुपट्टा तेरा सत रंग दा
जट्ट दी पसंद
चक दे फटे
ओये होये
जग जियोंडेयां दे मेले
मुंडियां तो बच के
अख दे इशारे उत्ते
सानू नच के देखा
लक 28 कुड़ी दा
दिल ले गई कुड़ी गुजरात दी
ढोल जगीरो दा
उड़ें जब जब जुल्फें तेरी
भांगड़ा पा ले
परांदा, कंगनी, विशेष जाट
लौंग लाची
लोहड़ी के पर्व में भांगड़ा उत्सव की सच्ची आत्मा को जीवंत करता है। यह नृत्य किसानों की मेहनत, प्रकृति के प्रति आभार और नई फसल की खुशी को सुंदर रूप से व्यक्त करता है। ढोल की गूंज पर किए गए जोशीले कदम लोगों को आपस में जोड़ते हैं, सकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं और सामूहिक आनंद का भाव जगाते हैं। लोहड़ी में किया जाने वाला भांगड़ा फसल उत्सव, एकता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है, जो इस पर्व को पूर्ण, उल्लासपूर्ण और यादगार बना देता है।
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